"शूल कुछ ऐसे, पगो में
चेतना की स्फूर्ति भरते,
तेज़ चलने को विवश
करते, हमेशा जबकि गड़ते.."
बच्चन जी की इस कविता 'यात्रा और यात्री' की शुरुआत हुई है.."साँस चलती है तुझे चलना पड़ेगा ही मुसाफिर!" पंक्ति से, लेकिन मुझे बीच की ये पंक्तियाँ किसी न किसी कारण वश अक्सर याद आ जाया करती हैं|यहाँ स्वयं शूल ही यात्री की चेतनता और स्फूर्ति का कारण बने हैं| ऐसा लगता है की ज़िन्दगी के रास्तों में शूलों का होना जितना स्वाभाविक है उतना ही ज़रूरी भी| इनकी चुभन हमे तेज़ चलने को प्रेरित भी करती है और मंजिल तक पहुचने का साहस भी देती है| इन पंक्तियों से एक निर्णय ये भी निकलता है की जिसने अपने मार्ग में जितने शूल देखे हैं, फूलों की कोमलता और सफलता के स्वाद का अनुमान वह उतना ही बेहतर लगा सकता है| सुख और सफलता पर हर किसी का बराबर हक़ है, और हर वो इंसान जो आगे बढ़ना जानता है, यात्रा करना जनता है, उसे मिलती भी है, लेकिन संभवता इसका महत्त्व और इसका सम्मान वो लोग बेहतर कर पाते हैं जिन्होंने अपने मार्ग में शूल भी देखे हैं और फूल भी|
अपने मार्ग में आये, आ रहे, और आने वाले, अपने हिस्से के शूलों व संघर्षों से मुझे कभी शिकायत तो कभी मायूसी ही रही है, लेकिन इन पंक्तियों को दोहराने से लगता है की मार्ग में इनका होना कितना ज़रूरी है, साथ ही साथ ये आशा भी बंध ही जाती है की जब मेरे हिस्से में खिले फूलों की बारी आएगी तो शायद उसकी कोमलता, उसकी सुगंध और उसके सुख का आभास, मुझे औरों से अधिक होगा| लेकिन ये सोच जितना मन को संतुष्ट और शांत बनाती है, इसके आगे की पंक्तियाँ उसे दुबारा उतना ही अधिक संशय में डाल देती हैं..
..वह कठिन पथ और कब
उसकी मुसीबत भूलती है,
साँस उसकी याद करके
भी अभी तक फूलती है;
यह मनुज की वीरता है
या कि उसकी बेहयाई,
साथ ही आशा सुखों का
स्वप्न लेकर झूलती है
सत्य सुधियाँ, झूठ शायद
स्वप्न, पर चलना अगर है,
झूठ से सच को तुझे
छलना पड़ेगा ही, मुसाफिर;
साँस चलती है तुझे
चलना पड़ेगा ही मुसाफिर!
खैर आशाओं को सुखों के स्वप्न में झूलते रहने देने और जीवन भर अपनी यात्रा जारी रखने के अतरिक्त न ही मानव के पास दूसरा कोई उपाय है और न ही कोई अतिरिक्त विकल्प|

